Uttarakhand

उत्तराखंड में गर्भवतियों की मौत का सिलसिला लगातार जारी… आखिर कब थमेगा ये सिलसिला

उत्तराखंड में डॉक्टर और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ने के बावजूद गर्भवतियों की मौत के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले पांच सालों में गर्भवतियों की मौत के आंकड़ों में लगातार इजाफा हो रहा है। कभी इलाज न मिलने, कभी एम्बुलेंस न मिलने और कभी प्रसव की दिक्कतों की वजह से आए दिन गर्भवतियां दम तोड़ रही हैं। एक तरफ देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है दूसरी तरफ पहाड़ की महिलाओं को जीवन बचाने के लिए समय पर इलाज नहीं मिल रहा। राज्य में पिछले पांच सालों में 798 गर्भवतियों की मौत हुई। यह स्थिति तब है जब मातृ व शिशु कल्याण के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं और देश के ज्यादातर हिस्सों में मातृ मृत्यु दर का ग्राफ नीचे गिर रहा है।

उत्तरकाशी जिले में एक गर्भवती महिला की मौत को लेकर उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा ने सरकार पर निशाना साधा है। माहरा ने कहा कि सरकार के पास धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान फूल बरसाने के लिए हेलीकॉप्टर है, लेकिन गंभीर बीमार की जिंदगी बचाने के लिए हेलीकॉप्टर नहीं है। पांच साल में 798 महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ चुकी हैं। इसके लिए राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं जिम्मेदार हैं। माहरा कांग्रेस भवन में मीडिया से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में जहां मातृ मृत्यु दर के मामले कम हो रहे हैं। वहीं उत्तराखंड में पिछले पांच साल में इसके मामले बढ़े हैं। इसमें उत्तराखंड देश में 18वें स्थान पर पहुंच गया है।

पर्वतीय क्षेत्रों की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, अस्पतालों की दूरी, अस्पतालों में जरूरी सुविधाओं का न होना, विशेषज्ञ डॉक्टरों का न होना जैसी मुश्किलें हिमालयी राज्य की महिलाओं के सुरक्षित प्रसव में बाधा बन रही हैं। स्वास्थ्य विभाग में 64 प्रतिशत महिला रोग विशेषज्ञ और 60 प्रतिशत बाल रोग विशेषज्ञ नहीं हैं। पर्याप्त चिकित्सा सुविधा के अभाव में नवजात एवं प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत हो रही है। प्रदेश में वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच कुल 798 महिलाओं ने प्रसव के दौरान या प्रसव से जुड़ी मुश्किलों के चलते दम तोड़ा है। वर्ष 2016-17 में राज्य में कुल 84 मातृ मृत्यु हुई। 2017-18 में 172, 2018-19 में 180, 2019-20 में 175 और 2020-21 में 187 महिलाओं ने बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया में जान गंवाई।

उत्तराखंड में पिछले पांच सालों में डॉक्टरों की संख्या में पचास प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2017 में राज्य में जहां कुल 1500 डॉक्टर तैनात थे वह संख्या अब बढ़कर 2300 के करीब हो गई है। इसी तरह अस्पतालों की सुविधाओं में भी काफी इजाफा हुआ है। लेकिन उत्तराखंड में मातृ मृत्यु दर के मामले कम होने की बजाए बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार राज्य में 84% गर्भवती महिलाओं के प्रसव अस्पतालों में हो रहे हैं। लेकिन आज भी 16% प्रसव कहां हो रहे इसकी जानकारी विभाग के पास नहीं है। उत्तराखंड मातृ मृत्यु की दर में भले ही देश से बेहतर स्थिति में है लेकिन यहां अभी भी प्रति एक लाख प्रसव पर 101 महिलाओं की मौत हो रही है। देश में प्रति लाख प्रसव पर 103 महिलाओं की मौत हो रही है।

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