देश का सर्वाधिक भूस्खलन-प्रवण जिला अब 53 लाख पर्यटकों के अनियंत्रित बोझ तले दब रहा है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले से एक चिंताजनक तस्वीर उभर कर सामने आई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लैंडस्लाइड एटलस 2023 के अनुसार टिहरी गढ़वाल पूरे देश में सर्वाधिक भूस्खलन-प्रवण जिला है और यही जिला अब हर साल 53 लाख से अधिक पर्यटकों की भीड़ झेल रहा है। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में राज्य में रिकॉर्ड 6.03 करोड़ पर्यटक आए, राज्य गठन के बाद का सर्वोच्च आँकड़ा। इनमें से अकेले टिहरी जिले में 53.29 लाख पर्यटक पहुँचे, जबकि जिले की स्थायी जनसंख्या मात्र 6.18 लाख है। अर्थात् पर्यटकों की संख्या जिले की आबादी से 86 गुना अधिक है एक ऐसे भू-भाग में, जहाँ की धरती स्वयं अत्यंत नाजुक और अस्थिर है।
टिहरी गढ़वाल की भूगर्भीय वास्तविकता अत्यंत कठोर है। यह जिला भूकंप के उच्चतम जोखिम वाले जोन VI में स्थित है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि पर्वतीय पर्यटन की एक वैज्ञानिक सीमा होती है। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (रानीचौरी, टिहरी गढ़वाल) और GB पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के शोधकर्ताओं ने Scientific Reports (Nature Portfolio, अक्टूबर 2025) में प्रकाशित अध्ययन में चारधाम की दैनिक वहन क्षमता निर्धारित की है। गंगोत्री के लिए मात्र 6,133 से 8,178 पर्यटक प्रतिदिन, यमुनोत्री के लिए 4,620 से 6,160, केदारनाथ के लिए 9,833 से 13,111 और बदरीनाथ के लिए 15,778 जबकि वर्ष 2023 में चारधाम में कुल 50 लाख से अधिक तीर्थयात्री मात्र 6 माह में पहुँचे, जो वैज्ञानिक सीमाओं को बार-बार तोड़ता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने सितंबर 2024 में राज्य को पर्यटन वहन क्षमता का अध्ययन करने का निर्देश दिया हैं
इस विश्व पर्यावरण दिवस पर जब दुनिया ‘हमारी धरती, हमारा भविष्य’ का संकल्प ले रही है, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की माँग है कि सरकार टिहरी गढ़वाल के लिए तत्काल अनिवार्य वहन क्षमता अध्ययन कराए, संवेदनशील क्षेत्रों में दैनिक पर्यटक सीमा तय करे, गंगोत्री मार्ग पर GLOF पूर्व-चेतावनी प्रणाली स्थापित करे और नदियों के 100 मीटर के भीतर निर्माण पर NGT के प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करे। “पर्यटन वरदान होना चाहिए, अभिशाप नहीं।” यदि अभी नहीं जागे, तो पहाड़ अपनी भाषा में जवाब देंगे, जैसा वे पहले भी दे चुके हैं।
डॉ. अंजु पंवार , यू -प्रिपेयर पर्यावरण विशेषज्ञ , यूएसडीएमए उत्तराखण्ड

