भारत में उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। देश के प्रमुख वित्तीय विश्लेषकों और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कॉलेज की डिग्री अब सफल करियर की गारंटी नहीं रही। बदलते तकनीकी दौर में कंपनियां प्रमाणपत्र से ज्यादा व्यावहारिक कौशल, नवाचार और समस्या समाधान की क्षमता को प्राथमिकता दे रही हैं।

मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक एवं मुख्य निवेश अधिकारी (CIO) सौरभ मुखर्जी ने एक पॉडकास्ट में कहा कि भारत में 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़कर कौशल आधारित कार्य करने वाले कई युवा आर्थिक रूप से उन छात्रों से बेहतर स्थिति में हैं, जो वर्षों तक कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका दावा है कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था युवाओं को उद्योगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तैयार नहीं कर पा रही है।

उन्होंने रोजगार से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि कॉलेज से निकलने वाले अधिकांश युवाओं को तुरंत रोजगार नहीं मिल पाता, जबकि कुशल तकनीकी कार्यों से जुड़े लोगों की मांग लगातार बढ़ रही है। निर्माण, मशीन संचालन, इलेक्ट्रिकल, प्लंबिंग और अन्य ट्रेड आधारित क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोग कई बार सामान्य स्नातकों की तुलना में अधिक आय अर्जित कर रहे हैं।

सौरभ मुखर्जी के अनुसार भारतीय शिक्षा प्रणाली आज भी रटने और परीक्षा आधारित मूल्यांकन पर अधिक निर्भर है। इसके विपरीत दुनिया तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), बायोटेक्नोलॉजी, क्लीन टेक और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों की ओर बढ़ रही है, जहां व्यावहारिक कौशल और नवाचार की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इसी मुद्दे पर भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी युवाओं से पारंपरिक करियर सोच से बाहर निकलने की अपील की है। उनका कहना है कि जर्मनी, स्विट्जरलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में वेल्डिंग, प्लंबिंग, कारपेंट्री और इलेक्ट्रिकल रिपेयर जैसे ट्रेड स्किल्स को सम्मानजनक और अच्छी आय वाले पेशे के रूप में देखा जाता है, जबकि भारत में अभी भी इन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य का रोजगार बाजार केवल डिग्रीधारकों का नहीं, बल्कि उन लोगों का होगा जिनके पास तकनीकी दक्षता के साथ-साथ संवाद, सेवा, समस्या समाधान और रचनात्मक सोच जैसी मानवीय क्षमताएं भी हों। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच ऐसे कौशल अधिक महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं जिन्हें मशीनें आसानी से प्रतिस्थापित नहीं कर सकतीं।

इस बहस को वैश्विक स्तर पर भी समर्थन मिलता रहा है। एलन मस्क कई बार कह चुके हैं कि उनकी कंपनियों में भर्ती के लिए कॉलेज डिग्री अनिवार्य नहीं है, बल्कि उम्मीदवार की वास्तविक क्षमता और कौशल अधिक मायने रखते हैं। वहीं प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल भी युवाओं को वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में समय लगाने के बजाय उद्यमिता और व्यावहारिक कौशल विकसित करने की सलाह दे चुके हैं।

हालांकि शिक्षा विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह बहस “डिग्री बनाम स्किल” की नहीं, बल्कि “डिग्री के साथ स्किल” की है। उनका कहना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और तकनीकी दक्षता ही भविष्य के रोजगार बाजार में सफलता की सबसे मजबूत कुंजी होगी।